
- सिर्फ कारपूलिंग 2050 में जी20 देशों का यात्री परिवहन उत्सर्जन सालाना 20 प्रतिशत तक घटा सकती है
- इस बचत का 80-88 प्रतिशत हिस्सा विकसित देशों और चीन के खाते में आएगा
- 2050 तक मिशन लाइफ जैसे व्यवहार परिवर्तन से संपूर्ण रूप से 2024 की वैश्विक तेल मांग के 59 प्रतिशत के बराबर बचत हो सकती है
नई दिल्ली, 03 सितंबर 2026: जैसे-जैसे सरकारें इलेक्ट्रिक वाहनों की दिशा में बदलाव को तेज कर रही हैं, अगर जी20 (G20) देशों के यात्री कारपूलिंग, बसों का अधिकाधिक उपयोग करें और सप्ताह के कुछ दिन घर से काम करने के उपाय लागू करें, तो 2050 तक सालाना यात्री परिवहन से होने वाला 408-538 मिलियन टन तक कार्बन डाइऑक्साइड (MtCO₂) उत्सर्जन घट सकता है। यह 2024 में दक्षिण अफ्रीका के पूरे साल भर के कार्बन उत्सर्जन के लगभग बराबर है। यह जानकारी 'काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर' (CEEW) की ओर से आज जारी किए गए एक नए स्वतंत्र अध्ययन से सामने आई है।
सीईईडब्ल्यू का यह अध्ययन, 'अ ग्लोबल मिशन लाइफ: मिटिगेशन पोटैंशियल ऑफ बिहेवियरल चेंजेज इन पैसेंजर ट्रांसपोर्ट इन जी20 कंट्रीज', भारत के मिशन लाइफ पर आधारित है। इस फ्रेमवर्क को कॉप26 में इस उद्देश्य से जारी किया गया था कि सततशील और कम कार्बन उत्सर्जन वाली आदतें रोजमर्रा के फैसलों के केंद्र में आ जाएं। अध्ययन इस बात का मॉडल तैयार करता है कि अगर ऐसे ही बदलाव जी20 देशों में अपनाए जाएं तो इसका क्या असर होगा। लेकिन कारपूलिंग, हाइब्रिड वर्क (hybrid work) और बसों के उपयोग से मिलने वाले लाभ सभी जगहों एक समान नहीं होते हैं। विकसित देश और चीन में, जहां कार का स्वामित्व और यात्रा की औसत दूरी सबसे अधिक है, इस संपूर्ण बचत का 80-88 प्रतिशत हिस्सा आएगा, जबकि अकेले अमेरिका और यूरोपीय यूनियन (ईयू-15) का हिस्सा 61-63 प्रतिशत होगा। प्रति व्यक्ति के स्तर पर यह अंतर और भी सख्त है: इन सभी बदलावों से एक औसत अमेरिकी की प्रति व्यक्ति उत्सर्जन बचत की संभावना एक भारतीय की तुलना में 56 गुना तक अधिक है।
डॉ. वैभव चतुर्वेदी, सीनियर फेलो, सीईईडब्ल्यू, ने कहा, “मिशन लाइफ के जरिए भारत की यह अपील थी कि जलवायु कार्रवाई (climate action) को उत्पादन से आगे ले जाकर जिम्मेदारीपूर्ण उपभोग से जोड़ा जाए। सीईईडब्ल्यू का यह अध्ययन उसी दृष्टि को एक वैश्विक साक्ष्य का आधार देता है। परिवहन व्यवहार में बदलाव का सबसे बड़ा फायदा उन अर्थव्यवस्थाओं में मौजूद है, जहां पर उत्सर्जन सर्वाधिक है और जहां पर आवागमन प्रणाली कारों पर सर्वाधिक निर्भर है। यह स्मार्ट शहरों, बेहतर कार्यस्थलों, स्वच्छ आवागमन पर अधिक ध्यान देने और तेल पर निर्भरता घटाने की अपील है, ताकि जीवन गुणवत्ता बेहतर हो सके।”
यही बदलाव ऊर्जा सुरक्षा भी सुनिश्चित कर सकता है और इसका सबसे ज्यादा फायदा उन्हीं देशों को होगा जो तेल के सबसे बड़े उपयोगकर्ता हैं। इसकी वजह यह है कि कारों की अधिक संख्या और यात्रा की लंबी दूरियां उन्हें परिवहन के लिए तेल का सबसे बड़ा उपभोक्ता भी बनाती हैं। व्यवहार परिवर्तन से 2025 से 2050 के बीच परिवहन में लगभग 2,715 मिलियन टन तेल की खपत कम की जा सकती है, जो 2024 की वैश्विक तेल मांग के करीब 59 प्रतिशत के बराबर है, और अप्रैल 2026 की तेल कीमतों के आधार पर इसका कुल मूल्य लगभग 2.3 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर होता है। भूराजनीतिक टकराव से तेल कीमतों में बढ़ोतरी के प्रति जो देश सबसे अधिक संवेदनशील हैं, उनके लिए यह एक जरूरी क्लाइमेट एक्शन होने के साथ-साथ बचाव का एक उपाय भी है।
कारपूलिंग अकेला ऐसा सबसे बड़ा उपाय है, जिससे प्रति वर्ष 236 से 411 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड (MtCO₂) के उत्सर्जन को कम किया जा सकता है। हालांकि, इससे होने वाली 92 प्रतिशत तक की बचत विकसित देशों और चीन तक ही सीमित है, जो इन क्षेत्रों में उच्च कार स्वामित्व और वाहनों में यात्रियों की कम औसत संख्या दर्शाती है।
रोहिणी दीक्षित, प्रोग्राम एसोसिएट, सीईईडब्ल्यू, ने कहा, “हमारा अध्ययन दिखाता है कि उत्सर्जन बचत (emission savings) का भूगोल मायने रखता है। विकसित देशों और चीन में कुल बचत की संभावना सबसे अधिक है, क्योंकि उनकी आवागमन व्यवस्था कारों पर अधिक निर्भर है, जबकि भारत की प्रति व्यक्ति उत्सर्जन बचत संभावना बहुत कम है। भारत और अन्य विकासशील देशों के लिए यह अवसर है कि वे भविष्य को निजी वाहनों पर निर्भर बनाने से बचें। संपन्न और कारों पर निर्भर अर्थव्यवस्थाओं के लिए व्यवहार परिवर्तन निकट अवधि में निश्चित तौर पर जलवायु शमन (climate mitigation) का उपाय बन जाना चाहिए।”
सीईईडब्ल्यू का सुझाव है कि जी20 देश व्यवहार परिवर्तन से होने वाले शमन को मापने के उपायों को जलवायु नीति के एजेंडे में शामिल करें, ताकि इस बचत को सत्यापित करने के साझा तरीके राष्ट्रीय जलवायु योजनाओं (national climate plans) में जोड़ा जा सके। विकसित देशों और चीन में, जहां उत्सर्जन बचत के लिए सबसे अधिक संभावना है, कारपूलिंग प्लेटफॉर्म, हाइब्रिड वर्क के मानक, और भीड़भाड़ व पार्किंग पर शुल्क के जरिए सबसे तेजी से कदम उठाए जाने चाहिए। विकासशील देशों को निजी वाहनों के उपयोग को सीमित करने वाले कदमों से पहले बसों के बेड़ों के विस्तार और उनके इलेक्ट्रिफिकेशन के साथ-साथ साझा परिवहन (shared mobility) के प्रोत्साहन को तैयार करने को प्राथमिकता देनी चाहिए।
Rohini Dikshit, Chetna Arora, Pallavi Das और Vaibhav Chaturvedi का पूरा अध्ययन, "A Global Mission LiFE: Mitigation Potential of Behavioural Change in Passenger Transport in G20 Countries", पढ़ने के लिए यहां पर क्लिक करें।
नोट: दोनों श्रेणियों के देश इस प्रकार हैं: विकासशील देश (अर्जेंटीना, ब्राजील, भारत, इंडोनेशिया, मैक्सिको, दक्षिण अफ्रीका) और विकसित देश व चीन (ऑस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड, कनाडा, चीन, ईयू-15, तुर्की, जापान, सऊदी अरब, रूस, दक्षिण कोरिया, अमेरिका)। इस अध्ययन में ग्लोबल चेंज एनालिसिस मॉडल (Global Change Analysis Model, GCAM V8.2) का उपयोग किया गया है, जिसमें हाइब्रिड वर्क को आवागमन की कम आवृत्ति के रूप में, कारपूलिंग को प्रति वाहन अधिक सवारियों के रूप में, और बसों के उपयोग को यात्रियों की पसंद में बदलाव के रूप में मॉडल किया गया है, और यह जी20 देशों पर लागू है, जिनकी हिस्सेदारी वैश्विक जीडीपी (GDP) में 84 प्रतिशत और वैश्विक CO₂ उत्सर्जन में 78 प्रतिशत है।