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छोटी बसें संकरे और मध्यम मांग वाले मार्गों पर पब्लिक ट्रांसपोर्ट की कमी पूरी करने में सक्षम, सर्वे में शामिल 96 प्रतिशत यात्रियों ने माइक्रो बस सेवा का समर्थन किया: सीईईडब्ल्यू अध्ययन

- माइक्रोबस सेवा के सभी यात्रियों में से 63.7 प्रतिशत यात्री ऑटो और ई-रिक्शा, जबकि 14 प्रतिशत दोपहिया वाहन छोड़कर आए थे
- कम किराया (78 प्रतिशत), एयर कंडीशनिंग व आराम (74 प्रतिशत) और सुरक्षा (55 प्रतिशत) ने यात्रियों को माइक्रोबस की तरफ आकर्षित किया
- माइक्रोबस वाहन श्रेणी को स्टेज-कैरिज संचालन के लिए उपयुक्त पाया गया है, खासकर संकरे रास्तों पर, लेकिन मौजूदा वाहनों की डिजाइन में बदलाव करने की जरूरत है
- छत्तीसगढ़ सरकार के सहयोग और आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय (MoHUA) के मार्गदर्शन में सीईईडब्ल्यू ने रायपुर में 45 दिनों के माइक्रोबस पायलट प्रोजेक्ट का संचालन किया

नई दिल्ली, 23 अक्टूबर 2026: छोटी बसें यानी माइक्रोबस, भारतीय शहरों की संकरी और भीड़भाड़ वाली सड़कों पर, खासकर छोटे और मध्यम शहरों में, सार्वजनिक परिवहन की कमी को पूरा कर सकती हैं। रायपुर माइक्रोबस पायलट प्रोजेक्ट के तहत सर्वे में शामिल यात्रियों में से 96 प्रतिशत ने दैनिक आवागमन के लिए माइक्रोबस सेवाओं का समर्थन किया। यह जानकारी 'काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर' (CEEW) के एक नए अध्ययन "आर माइक्रोबसेज सूटेबल ऐज पब्लिक ट्रांसपोर्ट व्हीकल्स?" से सामने आई है, जिसे आज 19वें अर्बन मोबिलिटी इंडिया (Urban Mobility India, UMI) कॉन्फ्रेंस में जारी किया गया है। सीईईडब्ल्यू ने छत्तीसगढ़ सरकार के सहयोग से और आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय (MoHUA) के मार्गदर्शन में रायपुर में 45 दिनों का एक माइक्रोबस पायलट प्रोजेक्ट संचालित किया था।

जून-जुलाई 2026 में चले इस पायलट प्रोजेक्ट के दौरान, 17 से 22 सीटों वाली आठ एयर-कंडीशंड गाड़ियों का रोजाना सुबह 06:00 से रात के सात बजे तक दो मुख्य मार्गों, रायपुर जंक्शन-आईएसबीटी भाठागांव और रायपुर जंक्शन-टाटीबंध, पर संचालन किया गया। इन माइक्रोबसों की मांग में तेज बढ़ोतरी हुई। पायलट प्रोजेक्ट के दौरान कुल 18,682 बार यात्री माइक्रोबस में सवार हुए, यानी प्रतिदिन औसतन 480 यात्रियों ने सफर किया, और एक दिन में सर्वाधिक 722 यात्रियों ने माइक्रोबस में सफर किया।

बसों से यात्रा करने वाले 500 यात्रियों के बीच सर्वे से पता चला कि इनमें से आधे से थोड़ा ज्यादा (53 प्रतिशत) कामकाजी लोग थे, जो हफ्ते में लगभग चार बार सफर करते थे और प्रत्येक यात्रा में 4-12 किलोमीटर की दूरी तय करते थे। कुल मिलाकर, माइक्रोबसों का रुख करने वाले यात्रियों में 63.7 प्रतिशत यात्री ऑटो और ई-रिक्शा छोड़कर आए थे, जबकि 14 प्रतिशत यात्रियों ने दोपहिया वाहन छोड़कर इसे चुना था। इसमें कम किराया (78 प्रतिशत), एयर कंडीशनिंग व आराम (74 प्रतिशत) और बेहतर सुरक्षा (55 प्रतिशत) जैसे कारणों ने लोगों को इन बसों की तरफ आकर्षित किया। माइक्रोबस से सफर करने वाले यात्रियों का औसत यात्रा खर्च उनकी पारिवारिक आय के 6.9 प्रतिशत से घटकर 3.1 प्रतिशत रह गया। सबसे कम आय वाले परिवारों के यात्रियों के लिए यह खर्च 13.9 प्रतिशत से घटकर 6.6 प्रतिशत हो गया था। माइक्रोबसों का आकार और श्रेणी स्टेज-कैरिज संचालन के लिए उपयुक्त पाए गए हैं। हालांकि, बस यात्रियों और चालक दल ने माइक्रोबसों के मौजूदा मॉडलों की डिजाइन में बदलाव करने के सुझाव दिए हैं, जैसे बीच में खड़े होने की जगह को चौड़ा करना, सामान रखने की जगह बनाना, लेग स्पेस बढ़ाना, इत्यादि।

हिमानी जैन, फेलो, सीईईडब्ल्यू, ने कहा, "सड़कों पर भीड़भाड़, वाहनों से जुड़े वायु प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैसों (GHG) की बढ़ती समस्या से निपटने के लिए बहुत जरूरी है कि भारतीय शहरों में सार्वजनिक परिवहन की हिस्सेदारी बढ़े। लेकिन भारतीय बाजारों में ऐसी उपयुक्त छोटी बसें अभी उपलब्ध नहीं हैं। सीईईडब्ल्यू का अध्ययन बताता है कि स्टैंडर्ड बसों के साथ-साथ माइक्रो बसें भी सार्वजनिक परिवहन का एक व्यावहारिक विकल्प हो सकती हैं। लेकिन परिवहन सेवा की मांग और सड़कों की चौड़ाई के अनुसार सही आकार की बसों का चुनाव करना बेहद जरूरी है। हमारे पायलट प्रोजेक्ट से पता चला है कि माइक्रो बसें पुराने शहरी इलाकों की संकरी सड़कों पर किफायती और भरोसेमंद सेवाएं दे सकती हैं। ये मेट्रो के लिए फीडर सेवा के रूप में, छोटे और मध्यम शहरों के रूटों पर, और उनके आसपास के उपनगरीय (पेरी-अर्बन) इलाकों को जोड़ने में भी उपयोगी हो सकती हैं।"

अनुमान है कि 2031 तक भारत में लगभग 4,200 वैधानिक शहर (statutory cities) होंगे, जबकि पीएम-ईबस सेवा योजना 169 बड़े शहरों को कवर करती है। भारत के लगभग 95 प्रतिशत शहर छोटे और मध्यम आकार वाले हैं, जिनकी आबादी 20,000 से 3 लाख के बीच है। इनमें से कई शहरों में बड़ी बस के लिए पर्याप्त यात्री उपलब्ध नहीं हैं, और उनकी सड़कें भी स्टैंडर्ड बसों के लिए बहुत संकरी हैं। सीईईडब्ल्यू के एक अन्य अध्ययन "माइक्रोबसेज हैव मेगा डिमांड इन इंडियन सिटीज: रीथिंकिंग पब्लिक ट्रांसपोर्ट फॉर ऑल 4,200 सिटीज" का अनुमान है कि 2031 तक भारतीय शहरों को लगभग 6.5 लाख माइक्रोबसों की जरूरत होगी, जिनमें से 77 प्रतिशत बसों की जरूरत छोटे और मध्यम आकार के शहरों में आएगी।

प्रमुख सुझाव

  • सड़कों के अनुसार बसों का आकार निर्धारित करें। पायलट प्रोजेक्ट में दिखी यात्री मांग के स्तर पर, 17 सीटों वाला वाहन 80 प्रतिशत सीट ऑक्यूपेंसी (seat occupancy) पर, जबकि नौ मीटर लंबी बस सिर्फ 42 प्रतिशत पर चलती है। इस कारण संकरे कॉरिडोर के लिए छोटी गाड़ियां कहीं अधिक कुशल साबित होती हैं। रायपुर जैसे छोटे और मध्यम शहरों को मुख्य, मझौले और स्थानीय सड़कों पर परिवहन की मांग और सड़क की चौड़ाई का आकलन करना चाहिए, और उसी के अनुसार सार्वजनिक परिवहन के लिए वाहनों का आकार निर्धारित करना चाहिए।
  • दूसरे मॉडल और ईंधन वाले वाहनों का परीक्षण करें। पायलट में सिर्फ दो डीजल मॉडल को परखा गया है। इसके अलावा, इलेक्ट्रिक माइक्रोबस के वेरिएंट अभी बाजार में व्यावसायिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए, अलग-अलग शहरों में अलग-अलग तकनीक वाले वाहनों के ऐसे कई परीक्षणों से ही पता चल पाएगा कि किस तरह के वाहन सफल हैं, और माइक्रोबस को सार्वजनिक परिवहन सेवा के रूप में चलाने पर कितना खर्च आता है।
  • माइक्रोबसों के लिए मानक निर्धारित करें और योजनाएं बनाएं। माइक्रोबस को सार्वजनिक परिवहन वाहन के रूप में बड़े पैमाने पर अपनाने के लिए शहरों को रायपुर जैसे पायलट के आधार पर तैयार वाहन मानकों व विशिष्टताओं, एसओपी और मॉडल अनुबंधों की जरूरत है। इसके साथ, इसे विस्तार देने के लिए पीएम-ईबस सेवा जैसी एक राष्ट्रीय योजना लाने की भी आवश्यकता है।

Read the full study, Are Microbuses Suitable as Public Transport Vehicles? Pilot on Narrow, Medium-Demand Routes in Raipur, Chhattisgarh by Anannya Jha and Himani Jain, here.

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