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धान की पराली की गांठें बनाने या उसे चारे में इस्तेमाल करने वाले हरियाणा के 5 में से 4 किसानों ने कहा कि वे आगे भी ऐसा करते रहेंगे, लेकिन गांठें बनाने वाले सिर्फ 7 प्रतिशत किसानों को भुगतान मिलता है: सीईईडब्ल्यू अध्ययन

- हरियाणा के किसान धान की पराली का 3 तरीकों से प्रबंधन करते हैं, जो अक्सर एक साथ अपनाए जाते हैं: चारे में 39 प्रतिशत, गांठें बनाने (बेलिंग) में 38 प्रतिशत और खेत में ही मशीनों से प्रबंधन (इन-सीटू) में 32 प्रतिशत
- किसानों का इरादा मजबूत है, आमदनी नहीं: गांठें बनाने या पराली को चारे में इस्तेमाल करने वाले 80 प्रतिशत किसानों का कहना है कि वे 2026 में भी ऐसा ही करेंगे। जिन किसानों ने बेलिंग की, उनमें से 31 प्रतिशत किसान अपने खेत साफ कराने के लिए पैसे चुकाते हैं
- खुले तौर पर उपलब्ध सैटेलाइट तस्वीरों के साथ रोजाना की कमर्शियल सैटेलाइट तस्वीरें जोड़ने पर, पंजाब के 5 गांवों में सिर्फ खुले तौर पर उपलब्ध तस्वीरों की तुलना में 2 से 5 गुना ज्यादा जले हुए खेत मिले, जो यह दिखाने की दिशा में एक कदम है कि कहां पर मशीनों और खरीदारों की जरूरत है

नई दिल्ली, 28 अक्टूबर 2026: हरियाणा में धान की पराली को खेत से हटाने वाले, यानी गांठें बनाना या उसे चारे में इस्तेमाल करना, किसानों में से प्रत्येक 5 में से 4 किसानों ने इस साल की शुरुआत में शोधकर्ताओं को बताया कि वे 2026 में भी पराली जलाने की जगह पर यही उपाय अपनाने की योजना बना रहे हैं। यह जानकारी 'काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर' (CEEW) के 1,588 किसानों के बीच एक नए स्वतंत्र सर्वेक्षण से सामने आई है। सीईईडब्ल्यू के अध्ययन में पाया गया है कि इसके पीछे मौजूद भुगतान की व्यवस्था अभी शुरुआती अवस्था में है और बिखरी हुई है: पराली की गांठें बनाने वाले सिर्फ 7 प्रतिशत किसानों को ही खरीदारों से भुगतान मिलता है। इस सर्वेक्षण को आज नई दिल्ली में एक राउंडटेबल में जारी किया गया। इसके साथ पंजाब में सैटेलाइट से जुड़े एक परीक्षण पर आधारित सीईईडब्ल्यू का एक अन्य अध्ययन भी जारी हुआ, जिसमें 5 गांवों में केवल निःशुल्क उपलब्ध तस्वीरों की तुलना में खेतों में हाल ही में जलने के निशान 2 से 5 गुना अधिक पाए गए।

उत्तर भारत में पराली जलाने के मामलों की अधिकता वाले पखवाड़े की शुरुआत हो रही है। वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (Commission for Air Quality Management, CAQM) ने 21 अक्टूबर को दिल्ली-एनसीआर में ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (Graded Response Action Plan, GRAP) का पहला चरण लागू कर दिया है, जिसे इस सीजन में पहली बार लागू किया गया है, जबकि दिल्ली सरकार का विंटर एक्शन प्लान 1 नवंबर से लागू होगा। पंजाब में 15 सितंबर से 27 अक्टूबर के बीच सैटेलाइट से आग की 717 घटनाएं दर्ज हुईं, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह संख्या 890 थी। अक्टूबर के आखिर और नवंबर की शुरुआत में पीक वाले दिनों में, दिल्ली के प्रतिदिन के PM2.5 में पराली जलाने का योगदान 40 प्रतिशत तक हो सकता है।

सीईईडब्ल्यू के पहले अध्ययन "मिटिगेटिंग स्टबल बर्निंग इन हरियाणा" के तहत जनवरी से मार्च 2026 के बीच 12 जिलों के 144 गांवों में किसानों का सर्वेक्षण किया गया, जहां 2018 से 2024 के बीच राज्य की खरीफ सीजन की आग की घटनाओं में से करीब 92 प्रतिशत मामले सामने आए थे। पराली की गांठें बनाने या उसे चारे के रूप में इस्तेमाल करने वाले किसानों में से 80 प्रतिशत ने कहा कि वे 2026 में भी ऐसा करते रहेंगे। किसान अब 3 तरीके अपना रहे हैं: 39 प्रतिशत किसान फसल अवशेष को चारे के रूप में इस्तेमाल करते हैं, 38 प्रतिशत उसकी गांठें बनाते हैं और 32 प्रतिशत सुपर सीडर जैसी मशीनों से उसे मिट्टी में मिला देते हैं। इनमें कई किसान ऐसे भी हैं, जो पराली प्रबंधन के लिए एक से अधिक उपाय अपनाते हैं। सर्वेक्षण में शामिल किसानों में से सिर्फ 6 प्रतिशत किसानों ने पराली जलाने की बात मानी, हालांकि अध्ययन के मुताबिक यह आंकड़ा वास्तविक स्थिति से कम दर्ज किए जाने की संभावना है। वहीं, 26 प्रतिशत किसानों ने अपने गांव में पराली जलाए जाने की बात बताई।

हरियाणा में करीब 80 प्रतिशत किसानों को पराली न जलाने पर 1,200 रुपये प्रति एकड़ की प्रोत्साहन राशि देने वाली पराली प्रोत्साहन योजना के बारे में जानकारी है। शोधकर्ताओं ने पाया कि समय पर भुगतान से भरोसा बना है। लेकिन सिर्फ 42 प्रतिशत किसानों ने इसके लिए आवेदन किया और योजना के तहत 57 प्रतिशत आवेदकों को भुगतान हुआ।

कुरिंजी केमंथ, प्रोग्राम लीड व पहले अध्ययन की सह-लेखक, सीईईडब्ल्यू, ने कहा, “हरियाणा के किसान हमें बताते हैं कि वे इस साल भी पराली न जलाने वाले विकल्पों को ही अपनाएंगे, जोकि उत्साहवर्धक है। लेकिन इरादा अपने आप अमल में नहीं बदलता है, बल्कि उससे होने वाली आय इसे बदलने का काम करती है। जब पराली किसानों के लिए कमाई का जरिया बनती है, तो जीरो-बर्न फार्मिंग अपने दम पर आगे बढ़ने लगती है।”

जीरो-बर्न को कमाई का जरिया बनाएं: बेलिंग करने वाले किसानों में से 87 प्रतिशत एग्रीगेटर (aggregators) की सेवाएं लेते हैं। इसके बावजूद सिर्फ 7 प्रतिशत किसानों ने बताया कि उन्हें खरीदारों से भुगतान मिलता है, लगभग 62 प्रतिशत किसान पराली मुफ्त में दे देते हैं और 31 प्रतिशत किसान अपने खेत साफ कराने के लिए प्रति एकड़ करीब 1,000 रुपये का भुगतान करते हैं। मशीनों पर खर्च भी अधिक आ रहा है: सुपर सीडर का इस्तेमाल करने वाले अधिकतर किसान देखने में 'साफ' और समतल खेत पाने के लिए मशीन को 2 या उससे ज्यादा बार चलाते हैं, जिससे लागत 4,000 से 4,500 रुपये प्रति एकड़ तक पहुंच जाती है। सीईईडब्ल्यू का अध्ययन बताता है कि सबसे अच्छा तरीका है कि सुपर सीडर को सिर्फ एक बार चलाया जाए, लेकिन उससे पहले सुपर स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम लगे कंबाइन हार्वेस्टर का इस्तेमाल किया जाए।

औद्योगिक मांग अभी बढ़नी बाकी है: हरियाणा ने उद्योगों में पराली के इस्तेमाल का अपना लक्ष्य 1.1 मिलियन टन से बढ़ाकर 2.3 मिलियन टन कर दिया है, लेकिन प्रस्तावित 7 कंप्रेस्ड बायोगैस प्लांट में से अभी 3 प्लांट ही चालू हो पाए हैं। सीईईडब्ल्यू की रिपोर्ट में मंजूरी पा चुके प्लांट पर तेजी से काम करने और एग्रीगेशन पॉइंट के पास गांठों के भंडारण की सुविधा बनाने का सुझाव दिया गया है, ताकि पराली की मांग किसानों तक पहुंच सके।

पूरे सीजन पर नजर रखी जाए: सर्वेक्षण में शामिल हरियाणा के जिन किसानों ने अपने गांव में पराली जलाए जाने की बात बताई, उनमें से 77 प्रतिशत ने कहा कि ऐसा शाम 4 बजे से रात 10 बजे के बीच होता है। पंजाब में सैटेलाइट अध्ययनों से पता चलता है कि पराली जलाने का पीक समय 2020 में करीब दोपहर 1.30 बजे था, जो 2024 में खिसककर करीब शाम 5 बजे हो गया। यह समय सैटेलाइट के गुजरने के बाद का समय है और आधिकारिक तौर पर दर्ज आग की संख्या से पीछे है। सीएक्यूएम ने देर शाम पराली जलाने के मामलों को सैटेलाइट की पकड़ से बचने का तरीका बताया है और पंजाब, हरियाणा व उत्तर प्रदेश को देर शाम गश्त बढ़ाने का निर्देश दिया है।

सीईईडब्ल्यू का दूसरा अध्ययन "बियॉन्ड सिंगल सोर्सेज: फ्यूजिंग ओपन एंड कमर्शियल सैटेलाइट डेटा फॉर मॉनिटरिंग क्रॉप रेजिड्यू बर्निंग इन इंडिया" यह परखता है कि क्या सेंटिनल-2 जैसी खुले तौर पर उपलब्ध सैटेलाइट तस्वीरों और कमर्शियल तस्वीरों को एक साथ रखने पर जले हुए खेतों की पहचान करना उन्नत हो सकता है। पंजाब के संगरूर और पटियाला के 1,600 वर्ग किलोमीटर इलाके में, 23 अक्टूबर से 7 नवंबर 2024 के बीच, जिन दिनों सेंटिनल-2 का डेटा उपलब्ध नहीं था, उन दिनों रोजाना की प्लैनेटस्कोप (PlanetScope) तस्वीरें जोड़ी गईं। इससे 5 गांवों में सिर्फ सेंटिनल-2 की तुलना में 2 से 5 गुना ज्यादा जले हुए खेत सामने आए। इस तरीके की कुल सटीकता लगभग 75 प्रतिशत है और यह जले हुए पिक्सेल में से करीब 54 प्रतिशत की सही पहचान करता है, इसलिए यह आग जलने की घटनाओं की गिनती करने की जगह नहीं लेता है, बल्कि उसके पूरक की तरह है। कमर्शियल तस्वीरें महंगी हैं, जिनकी कीमत 250 रुपये प्रति वर्ग किलोमीटर तक होती है। इसलिए यह अध्ययन पूरे सीजन का अनुमान लगाने के लिए कुछ चुनिंदा तारीखों पर इनका इस्तेमाल करने का सुझाव देता है। इस तरीके को अभी हरियाणा में नहीं परखा गया है।

मोहम्मद रफीउद्दीन, प्रोग्राम लीड व सैटेलाइट अध्ययन के सह-लेखक, सीईईडब्ल्यू, ने कहा, “किसान पराली न जलाएं, इसमें मदद करने के लिए भारत ने हजारों करोड़ का निवेश किया है, और राज्यों को यह जानने की जरूरत है कि यह मदद कहां पर काम कर रही है। आग की घटनाओं की गिनती हमें बस यह बताती है कि कहां पर संयोग से सैटेलाइट की मदद से आग दिखी है। अगर आग जलने के मामलों वाली जमीन को भी मापा जाए, तो पता चल सकता है कि किन गांवों को मशीनों और खरीदारों की जरूरत है। इससे राज्यों की जमीनी प्रगति की अधिक मुकम्मल तस्वीर भी मिल सकती है।”

सीईईडब्ल्यू के सैटेलाइट अध्ययन में सुझाव दिया गया है कि सीएक्यूएम आग की घटनाओं की गिनती के साथ जले हुए क्षेत्र के अनुमानों को भी शामिल करे। यह काम जले हुए क्षेत्र को मापने के उस प्रोटोकॉल पर आधारित हो, जिसका सीएक्यूएम भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के साथ पहले ही परीक्षण कर चुका है। अध्ययन में भारत की अपनी अर्थ ऑब्जर्वेशन क्षमता का इस्तेमाल करने का भी सुझाव दिया गया है, जैसे 12 सैटेलाइट का वह समूह (कॉन्स्टेलेशन), जिसे बेंगलुरु स्थित, पिक्सल (Pixxel) के नेतृत्व वाला कंसोर्टियम ध्रुव स्पेस (Dhruva Space), पियरसाइट (PierSight) और सैटश्योर (SatSure) के साथ मिलकर बना रहा है, जिसके पहले 4 सैटेलाइट को 2027 की शुरुआत में शुरू करने की योजना है।

एक साथ देखें तो दोनों अध्ययन धन और आकलन की कमी की तरफ इशारा करते हैं। किसान पराली को खेत से हटा रहे हैं, लेकिन बाजार अभी भी उनमें से अधिकतर किसानों को पर्याप्त भुगतान नहीं करता है। निगरानी अभी भी सरकारों को यह नहीं बता पा रही है कि जरूरी पैमाने पर और समय रहते कहां पर मदद की जरूरत है। सीईईडब्ल्यू के अध्ययन में सीएक्यूएम का एक पोर्टल लाने का सुझाव दिया गया है, जो उसके निर्देशों के पालन पर नजर रखे और सैटेलाइट से मिले आग व जले हुए क्षेत्र के आंकड़ों को जमीनी कार्रवाई से जोड़े।

Read the full studies released at the event:

  • Mitigating Stubble Burning in Haryana: Survey insights from 1500 farmers, by Srishti Jain, Kurinji Kemanth, Ayushman Saboo and Navjot Singh Sarao, here.
  • Beyond Single Sources: Fusing Open and Commercial Satellite Data for Monitoring Crop Residue Burning in India, by Sneha Maria Ignatious, Samruddhi Sharma, Rishikesh P. and Mohammad Rafiuddin, here.

Note: The Haryana survey used multi-stage stratified sampling of 1,588 landowning farmers across 144 villages in 12 districts, with quotas by landholding within villages and percentages weighted to district farmer populations. Responses are self-reported and subject to recall and social-desirability bias. The 77 per cent figure refers to respondents who reported burning in their village. The satellite method was tested in five villages in Sangrur and Patiala, Punjab; the 2–5x figure compares fields detected with Sentinel-2 alone and has not been validated against ground data.

For media queries and interviews, contact:
Tulshe Agnihotri – [email protected]

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