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भारत की जीवाश्म ईंधन असुरक्षा अब सिर्फ आयात पर निर्भरता की चुनौती नहीं, बल्कि पूरे तंत्र के लिए जोखिम है: सीईईडब्ल्यू रिपोर्ट

- भारत सिर्फ छह देशों से 85 प्रतिशत कच्चे तेल का आयात करता है
- भारत के पास 9 से 10 दिनों की ऑयल रिजर्व क्षमता है, जबकि ऑपरेशनल स्टॉक के जरिए 64 दिनों का अतिरिक्त कवर भी उपलब्ध है
- स्वच्छ ऊर्जा का घरेलू उत्पादन भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए सबसे मजबूत कवच बन सकता है

नई दिल्ली, 17 जून 2026: भारत की ऊर्जा सुरक्षा की चुनौती अब सिर्फ इस बात तक सीमित नहीं रह गई है कि देश कितना कोयला, तेल और गैस का आयात करता है। बल्कि इसमें एक गहरा जोखिम यह है कि भारत का जीवाश्म ईंधन आधारित तंत्र सभी स्तरों पर असुरक्षित हो गया है। 'काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर' (CEEW) के नए स्वतंत्र अध्ययन, "हाउ सिक्योर इज़ इंडियाज़ एनर्जी फ्यूचर? असेसिंग एक्सेसिबिलिटी, रिलायबिलिटी, एंड अफोर्डेबिलिटी" के अनुसार, इस असुरक्षा में आपूर्तिकर्ताओं की सीमित संख्या, जोखिम भरे समुद्री मार्ग, सीमित रिजर्व व भंडारण क्षमता, रिफाइनरी से जुड़ी बाधाएं और वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर शामिल है।

भारत ने 2024 में अपने कच्चे तेल का 88 प्रतिशत, प्राकृतिक गैस का लगभग 48 प्रतिशत और कोयले का लगभग 26 प्रतिशत हिस्सा आयात किया था। 2024-25 में भारत के कुल आयात बिल में जीवाश्म ईंधन का हिस्सा 28 प्रतिशत से अधिक था। वैश्विक स्तर पर भारत का हिस्सा तेल आयात में 8.6 प्रतिशत, वैश्विक एलएनजी व्यापार में लगभग 4 प्रतिशत और वैश्विक कोयला आयात में लगभग 15 प्रतिशत है। सीईईडब्ल्यू का यह अध्ययन बताता है कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा का जोखिम अब आम घरों, उद्योगों, सार्वजनिक वित्त, महंगाई और रणनीतिक स्वायत्तता तक फैल चुका हैं। यह अध्ययन भारत के प्रमुख जीवाश्म ईंधन (कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस) का तीन ऊर्जा सुरक्षा पैमानों - उपलब्धता (accessibility), विश्वसनीयता (reliability), और सामर्थ्य  (affordability) - के आधार पर आकलन करता है।

हेमंत मल्या, फेलो, सीईईडब्ल्यू, ने कहा, “भारत ने ऊर्जा तक पहुंच को मजबूत बनाया है, आपूर्ति के स्रोतों को विविधतापूर्ण बनाया है, और स्वच्छ ऊर्जा का दायरा भी बढ़ाया है। लेकिन हमारा अध्ययन दिखाता है कि ऊर्जा सुरक्षा के जोखिम और अधिक जटिल होते जा रहे हैं। कच्चे तेल, एलएनजी, एलपीजी, कोयले, या प्रमुख समुद्री मार्गों में आने वाली रुकावटें रसोई की लागत, ट्रांसपोर्ट फ्यूल की कीमतों, उर्वरक सब्सिडी, औद्योगिक प्रतिस्पर्धात्मकता और महंगाई को तुरंत प्रभावित कर सकती हैं। भारत को ऊर्जा सुरक्षा के अपने अगले चरण को जीवाश्म ईंधन को हासिल करने से आगे एक स्पष्ट परिवर्तन योजना (transition plan) की दिशा में बढ़ना चाहिए: जैसे गैस सिस्टम के उपयोग को अधिकतम स्तर तक ले जाना, रिफाइनरी को और अधिक विस्तार देने से बचना, व्यावहारिक इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) को अपनाने में तेजी लाना, उद्योगों का विद्युतीकरण, गैसोलीन की कम मांग के अनुरूप रिफाइनरियों को नए सिरे से तैयार करना और मजबूत ग्रीन टेक्नोलॉजी आपूर्ति श्रृंखलाओं का निर्माण करना।”

छह आपूर्तिकर्ता और रिफाइनरी की सीमाओं से भारत की कच्चे तेल की सुरक्षा के सामने बाधा

सीईईडब्ल्यू के अध्ययन में पाया गया है कि भारत के कच्चे तेल के आयात का 85% से अधिक हिस्सा केवल छह देशों से आता है, जिनमें रूस और पश्चिम एशियाई देश शामिल हैं, जो आपूर्ति में कोई रुकावट आने पर लचीलेपन को सीमित कर रहा है। यह जोखिम रिफाइनरियों की बनावट के कारण और बढ़ जाता है, क्योंकि भारत केवल कुछ विशेष श्रेणी के  कच्चे तेल को ही कम खर्च में साफ (प्रोसेस) कर सकता है। अध्ययन में लंबी अवधि में कच्चे तेल के स्रोतों में विविधता लाने और ब्राजील, गुयाना तथा पश्चिम अफ्रीका जैसे आपूर्तिकर्ताओं को शामिल करने, रिफाइनरियों के आधुनिकीकरण और रिफाइनरी में बदलाव लाने के लिए एक राष्ट्रीय योजना (national refinery transition plan) बनाने का सुझाव दिया गया है।

भारत का तेल रिजर्व 9-10 दिनों के लिए पर्याप्त; गैस का कोई रणनीतिक भंडारण (स्ट्रेटजिक रिजर्व) नहीं
सीईईडब्ल्यू के अध्ययन के अनुसार, भारत का रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (strategic petroleum reserves) केवल 9-10 दिनों के कच्चे तेल के आयात को कवर करता है। इसके अलावा रिफाइनरी के ऑपरेशनल स्टॉक में 64 दिनों का कवर उपलब्ध है, जो जापान (लगभग 200 दिन) और दक्षिण कोरिया (लगभग 207 दिन) जैसी अन्य प्रमुख आयात-निर्भर अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में बहुत कम है। गैस के मामले में, भारत अपनी कुल आपूर्ति का लगभग आधा हिस्सा एलएनजी के रूप में आयात करता है, लेकिन कोई समर्पित रणनीतिक गैस भंडारण (strategic gas storage) नहीं है। इससे उर्वरक कारखाने और शहरी गैस नेटवर्क की जोखिम के प्रति संवेदनशीलता बढ़ जाती है। अध्ययन में तेल, गैस और एलपीजी भंडारण को अनिवार्य और व्यावसायिक बनाने का सुझाव दिया गया है, जिसमें आपातकालीन स्टॉक की बाध्यताएं, खत्म हो चुके कुओं में गैस भंडारण, और जमीन के नीचे एलपीजी भंडारण को बढ़ाने जैसे कदम शामिल हैं।

एलपीजी भारतीय घरों की ऊर्जा-सुरक्षा की एक छिपी हुई कमजोरी है
एलपीजी (रसोई गैस) का उपयोग 33 करोड़ से अधिक भारतीय परिवारों में इस्तेमाल किया जाता है(सक्रिय घरेलू कनेक्शनों के आधार पर)। लेकिन भारत लगभग 95 प्रतिशत आपूर्ति के लिए आयात पर निर्भर है, चाहे वह सीधे तौर पर आयातित एलपीजी हो या फिर आयातित कच्चे तेल पर निर्भर एलपीजी का घरेलू उत्पादन। जैसा कि सीईईडब्ल्यू के पिछले अध्ययनों से पता चलता है, 2032 तक पेट्रोल की मांग अपने पीक पर पहुंच जाएगी और उसके बाद इसमें गिरावट आने लगेगी, जिससे रिफाइनरियों में अतिरिक्त नैफ्था (naphtha) इकट्ठा हो जाएगा, जिसे एलपीजी में बदला जा सकता है और आयात पर निर्भरता कम हो सकती है। लेकिन जब तक रिफाइनरी के ढांचों को इसके अनुरूप नए सिरे से तैयार नहीं किया जाता है, तब तक वैश्विक एलपीजी आपूर्ति में कोई भी रुकावट करोड़ों घरों की रसोई गैस को जोखिम में डाल सकता है।

उच्च कीमतों की स्थिति में आयातित गैस के कारण सीएनजी कीमतें 15-17% बढ़ सकती है
सीईईडब्ल्यू के अध्ययन में पाया गया है कि सामर्थ्य (अफोर्डेबिलिटी यानी गैस का किफायती या सस्ता होना) से जुड़ा जोखिम गैस क्षेत्र में सबसे ज्यादा दिखाई देता है। अध्ययन का अनुमान है कि अगर शहरी गैस वितरण में आयातित गैस की हिस्सेदारी 15 प्रतिशत से बढ़कर 50 प्रतिशत हो जाती है, तो वैश्विक स्तर पर ऊंची कीमतों की स्थिति में सीएनजी की कीमतें 15-17 प्रतिशत तक बढ़ सकती हैं। इससे एक किफायती संक्रमणकालीन ईंधन (transition fuel) के रूप में सीएनजी की भूमिका कमजोर हो सकती है, खास तौर पर ट्रांसपोर्ट कंज्यूमर्स के लिए। अध्ययन में प्राकृतिक गैस हब-इंडेक्स वाले एलएनजी अनुबंधों, जैसे कि हेनरी हब से जुड़े अनुबंधों की हिस्सेदारी बढ़ाने का सुझाव दिया गया है, ताकि कच्चे तेल की कीमतों के उतार-चढ़ाव के असर को घटाया जा सके और गैस को किफायती बनाए रखने की स्थिति को सुधारा जा सके।

भारत के कोकिंग कोल (coking coal) आयात को एक मजबूत सप्लाई चेन योजना की जरूरत है
अध्ययन में पाया गया है कि भारत के कोकिंग कोल सुरक्षा का जोखिम तेजी से बढ़ रहा है। इसका कारण स्टील निर्माण के लिए आयातित कोकिंग कोल पर लगातार बनी हुई निर्भरता - विशेष रूप से ऑस्ट्रेलिया पर है। इसके अलावा, गैर-कोकिंग कोल के आयात के लिए इंडोनेशिया की निर्यात नीतियों पर निर्भर होना भी एक बड़ी वजह है। राष्ट्रीय स्तर पर, कोयले की घटती गुणवत्ता और बढ़ती उत्पादन लागत यह संकेत देती है कि सशक्त अक्षय ऊर्जा (renewable power) की तुलना में कोयला आधारित बिजली का लागत लाभ घट रहा है। अध्ययन में सुझाव दिया गया है कि भारत को कोकिंग कोल सुरक्षा के लिए एक समर्पित विकल्प बनाना चाहिए, जिसमें आयात स्रोतों में विविधता लाना, रणनीतिक भंडारण और लंबी अवधि के आपूर्ति समझौते करना शामिल हैं, ताकि स्टील निर्माण क्षेत्र की असुरक्षा को कम किया जा सके और जिसकी आयातित कोयले में सबसे बड़ी हिस्सेदारी है।

स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में एक रणनीतिक बदलाव भारत को ऊर्जा सुरक्षा दे सकता है
सीईईडब्ल्यू का अध्ययन बताता है कि स्वच्छ ऊर्जा आयातित जीवाश्म ईंधन पर भारत की लगातार बनी हुई निर्भरता को कम कर सकती है। कोयला, तेल और गैस के विपरीत, अक्षय ऊर्जा प्रणालियां एक बार स्थापित होने के बाद राष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध ऊर्जा स्रोतों पर निर्भर होती हैं, जिससे ईंधन आपूर्ति में आने वाली रुकावटें, समुद्री मार्गों की बाधाएं और वैश्विक ईंधन की कीमतों के उतार-चढ़ाव का खतरा कम हो जाता है। हालांकि, अध्ययन यह भी चेतावनी देता है कि स्वच्छ ऊर्जा एक अलग तरह की रणनीतिक निर्भरता पैदा करती है: जैसे महत्वपूर्ण खनिज (क्रिटिकल मिनरल्स), प्रौद्योगिकियां (टेक्नोलॉजी) और औद्योगिक सामग्रियां। इस निर्भरता का घरेलू विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग), आपूर्ति श्रृंखला में विविधता, रीसाइक्लिंग और रणनीतिक अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों के माध्यम से प्रबंधन किया जाना चाहिए।

सुझाव

अध्ययन में पांच तात्कालिक प्राथमिकताओं का सुझाव दिया गया है: रणनीतिक तेल, गैस और एलपीजी भंडारों को अनिवार्य और व्यावसायिक बनाना; जहां व्यावसायिक रूप से व्यावहारिक हो वहां पर इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना और भारी माल ढुलाई के लिए एलएनजी के उपयोग में तेजी लाना; एक नेशनल रिफाइनरी ट्रांजिशन प्लान लाना, और एलपीजी आयात पर निर्भरता को घटाने के लिए इलेक्ट्रिक कुकिंग को बढ़ावा देना।

मध्यम और लंबी अवधि के लिए, यह अध्ययन कच्चे तेल और एलएनजी आपूर्ति में विविधता लाने, गैस हब-इंडेक्स एलएनजी अनुबंधों का विस्तार देने, रिफाइनरियों के आधुनिकीकरण, भविष्य की मांग के अनुरूप बुनियादी ढांचे तैयार करने, चुनिंदा घरेलू संसाधनों को विकसित करने, और विद्युतीकरण-आधारित मांग में तेजी लाने का सुझाव देता है। भारत की ऊर्जा सुरक्षा रणनीति को अब जीवाश्म ईंधन की आपूर्ति का जोखिम संभालने की जगह पर स्वच्छ ऊर्जा, विद्युतीकरण, रणनीतिक भंडार और मजबूत तकनीकी आपूर्ति श्रृंखलाओं के जरिए जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता को घटाने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।

Read the full study Securing India’s Energy Future: Assessing Fossil Fuel Risks through Accessibility, Reliability, and Affordability by Dharshan Siddarth Mohan, Karthik Shetty, Hemant Prakash Singh, Sabarish Elango, and Hemant Mallya here.

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