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REPORT
रियूज ऑफ ट्रीटेड वेस्टवॉटर इन इंडिया
मार्केट पोटेंशियल एंड रिकमेंडेशंस फॉर स्ट्रेंथनिंग गवर्नेंस
नितिन बस्सी, साइबा गुप्ता, कार्तिकेय चतुर्वेदी

प्रस्तावित उद्धरण: नितिन बस्सी, साइबा गुप्ता और कार्तिकेय चतुर्वेदी. 2023. रियूज ऑफ ट्रीटेड वेस्टवॉटर इन इंडिया: मार्केट पोटेंशियल एंड रिकमेंडेशंस फॉर स्ट्रेंथनिंग गवर्नेंस नई दिल्ली: काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर.

डिस्क्लेमर : यह मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित रिपोर्ट का हिंदी अनुवाद है। हमने इसके अनुवाद में पूरी सतर्कता बरती है। यदि इसमें कोई भ्रम होता है या भूलवश कोई त्रुटि सामने आती है तो इसका अंग्रेजी संस्करण ही मान्य होगा।

अवलोकन

अपशिष्ट जल की प्रचुर मात्रा को देखते हुए, भारत में उचित अपशिष्ट जल प्रबंधन (wastewater management) के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों में पानी की बढ़ती मांग को पूरा करने और अपने जल संबंधी पर्यावरण (water environment) में सुधार लाने की अपार संभावनाएं मौजूद हैं। यह अध्ययन भारत में उपचारित अपशिष्ट जल के पुनर्उपयोग को मुख्यधारा में लाने का समर्थन करता है। यह अध्ययन उपचारित अपशिष्ट जल (घरेलू सीवेज) को राष्ट्रीय स्तर पर सिंचाई के लिए दोबारा इस्तेमाल करने की आर्थिक और बाजार संभावनाओं का भी आकलन करता है और इसे दोबारा उपयोग में लाने के लिए मौजूदा व्यवस्था को मजबूत बनाने का भी सुझाव देता है।

मुख्य निष्कर्ष

  • यदि उपचारित अपशिष्ट जल को विभिन्न क्षेत्रों में दोबारा इस्तेमाल करने के लिए बिक्री करने की व्यवस्था होती तो 2021 में कुल उपलब्ध उपचारित अपशिष्ट जल का बाजार मूल्य 630 मिलियन रुपये होता। मौजूदा बाजार दर पर 2025 में उपचारित अपशिष्ट जल का बाजार मूल्य 830 मिलियन रुपये और 2050 में 1.9 बिलियन रुपये से अधिक हो जाएगा।
  • 2021 में भारत में उपलब्ध उपचारित अपशिष्ट जल का सिंचाई क्षेत्र के लिए उपयोग करके नई दिल्ली के नौ गुना क्षेत्र की सिंचाई की जा सकती थी। इसके अलावा, इस भूमि क्षेत्र से उत्पादित कृषि उपज से लगभग 966 बिलियन रुपये का राजस्व भी प्राप्त होता।
  • 2021 में उपलब्ध उपचारित अपशिष्ट जल से 6,000 मीट्रिक टन (MT) से अधिक पोषक तत्व प्राप्त किए जा सकते थे, जिससे इसी के समतुल्य सिंथेटिक उर्वरक के इस्तेमाल में गिरावट के चलते 50 मिलियन रुपये से अधिक की बचत होती।
  • उपचारित अपशिष्ट जल का सिंचाई में पुनर्उपयोग 2021 में ग्रीनहाउस गैस (GHG) के उत्सर्जन में 1.3 मिलियन टन की कमी ला सकता था।

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प्रोग्राम लीड
“उपचारित अपशिष्ट जल के पुनर्उपयोग को बढ़ावा देने से भारत के लिए कई लाभ और सकारात्मक बाहरी प्रभाव सामने आएंगे। यदि अपशिष्ट जल उपचार और पुनर्उपयोग को बढ़ावा देने के लिए वित्तीय रूप से व्यवहार्य मॉडल विकसित किया जाए, तो अकेले सिंचाई में इसके पुनर्उपयोग के लिए एक बड़ी बाजार संभावना मौजूद हैं।”

कार्यकारी सारांश

भारत में जल सुरक्षा एक अत्यधिक महत्वपूर्ण विषय है। केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) के नदी घाटियों (बेसिन) में जल उपलब्धता (सीडब्ल्यूसी 2021) के अनुमानों पर आधारित हमारे विश्लेषण के अनुसार, 2025 तक भारत में 15 प्रमुख नदी घाटियों में से 11 नदी घाटियों में जल संकट दिखाई देगा, जहां वार्षिक प्रति व्यक्ति नवीकरणीय जल उपलब्धता (renewable water availability) 1,700 क्यूबिक मीटर से कम होगी। इसलिए, मांग-आपूर्ति में मौजूद अंतर को भरने के लिए जल के वैकल्पिक स्रोतों को खोजना जरूरी है।

भारत में शहरी केंद्रों से प्रतिदिन निकलने वाले कुल अपशिष्ट जल के केवल 28 प्रतिशत हिस्से का ही ट्रीटमेंट (शोधन) हो पाता है (सीपीसीबी 2021)। शहरी केंद्रों से 72,368 मिलियन लीटर प्रतिदिन (एमएलडी) सीवेज निकलता है, जिसमें से वास्तविक रूप से सिर्फ 20,236 एमएलडी सीवेज का शोधन होता है (सीपीसीबी 2021)। श्रेणी-I शहर (जिनकी आबादी 1,00,000 से अधिक है) और श्रेणी-II शहर (जिनकी आबादी 50,000-99,999 के बीच है) कुल शहरी आबादी के एक बड़े हिस्से (72 प्रतिशत) का प्रतिनिधित्व करते हैं और यहां से निकलने वाले अनुमानित 38,254 एमएलडी सीवेज में से केवल 30 प्रतिशत का वास्तविक रूप से शोधन होता है (सीपीसीबी 2021)। गैर-उपचारित अपशिष्ट जल नदी जैसे मीठे जल निकायों में चला जाता है।

अपशिष्ट जल की प्रचुर मात्रा को देखते हुए, भारत में उचित अपशिष्ट जल प्रबंधन (wastewater management) के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों में पानी की बढ़ती मांग को पूरा करने और अपने जल संबंधी पर्यावरण (water environment) में सुधार लाने की अपार संभावनाएं मौजूद हैं।इस अध्ययन के माध्यम से, हमारा उद्देश्य राष्ट्रीय स्तर पर उपचारित अपशिष्ट जल (घरेलू सीवेज) के पुनर्उपयोग से जुड़ी बाजार संभावनाओं का अनुमान लगाना और पुनर्उपयोग से संबंधित व्यवस्था को मजबूत बनाने के बारे में सुझाव देना है।

दृष्टिकोण

हमने निम्नलिखित प्रयास किए हैं:

  • उपचारित अपशिष्ट जल (treated wastewater) की मात्रा का आकलन, जो विभिन्न क्षेत्रों में गैर-पेयजल उद्देश्यों के लिए ताजे पानी की मांग को पूरा कर सकती है
  • सिंचाई क्षेत्र पर जोर देने के साथ, जो ताजे जल का प्रमुख उपभोक्ता है, उपचारित अपशिष्ट जल के दोबारा इस्तेमाल के लिए आर्थिक और बाजार संभावना का आकलन
  • एक विश्लेषणात्मक रूपरेखा की मदद से भारत में उपचारित अपशिष्ट जल के दोबारा इस्तेमाल से जुड़ी सरकार की मौजूदा नीतियों की समीक्षा और विश्लेषण
  • प्रमुख प्रेरकों, कारकों और बाधाओं के संदर्भ में उपचारित अपशिष्ट जल के दोबारा इस्तेमाल के संबंध में विश्व की सर्वोत्तम पद्धतियों का विश्लेषण
  • भारत में उपचारित अपशिष्ट जल के दोबारा इस्तेमाल से संबंधित मौजूदा प्रबंधन को मजबूत करने के लिए सुझावों को एकत्रित करना
  • उपचारित अपशिष्ट जल के दोबारा उपयोग से संबंधित आर्थिक और बाजार संभावना

उपचारित अपशिष्ट जल के पुनर्उपयोग की आर्थिक और बाजार संभावनाएं

  • 2021 में भारत में दोबारा इस्तेमाल करने योग्य 11,622 मिलियन क्यूबिक मीटर (एमसीएम) उपचारित अपशिष्ट जल की अनुमानित मात्रा उपलब्ध थी। भविष्य में अनुमानित सीवेज और शोधन क्षमताओं के आधार पर, यह 2025 तक 15,288 एमसीएम और 2050 तक 35,178 एमसीएम हो जाएगी।
  • 2021 में उपलब्ध उपचारित अपशिष्ट जल का उपयोग करके नई दिल्ली से नौ गुना बड़े क्षेत्र की सिंचाई की जा सकती थी। हमारे विश्लेषण के अनुसार, 2021 में सिंचाई क्षेत्र में दोबारा इस्तेमाल के लिए लगभग 8,603 एमसीएम उपचारित अपशिष्ट जल उपलब्ध था; जिससे सिंचाई के लिए ताजे पानी की समतुल्य मांग पूरी की जा सकती थी। इसमें 1.38 मिलियन हेक्टेयर (एमएचए) भूमि की सिंचाई करने की क्षमता थी, जो नई दिल्ली के क्षेत्रफल के लगभग नौ गुने के बराबर है (चित्र ईएस 1)। 2050 तक यह क्षमता नई दिल्ली के क्षेत्रफल का लगभग 26 गुना हो जाएगी।

​चित्र ईएस1: 2021 में उपलब्ध उपचारित अपशिष्ट जल का इस्तेमाल करके 1.38 एमएचए क्षेत्र की सिंचाई की जा सकती थी

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स्रोत: भारत सरकार के जल संसाधन मंत्रालय (एमओडब्ल्यूआर) के नेशनल कमीशन फॉर इंटीग्रेटेड वॉटर रिसोर्सेज डेवलपमेंट प्लान (1999), जल संसाधन मंत्रालय, भारत सरकार की रिपोर्ट के आंकड़ों के आधार पर लेखकों का विश्लेषण

  • 2021 में उपचारित अपशिष्ट जल को सिंचाई के लिए दोबारा इस्तेमाल करने से 966 बिलियन रुपये का राजस्व सृजित हो सकता था। हमारा आकलन है कि 2021 में सिंचाई के लिए उपलब्ध उपचारित अपशिष्ट जल का दोबारा इस्तेमाल करके 28 मिलियन मीट्रिक टन (एमटी) चुनिंदा बागवानी फसलें उगाई जा सकती थी। इस उपज से 966 बिलियन रुपये का राजस्व सृजित हो सकता था (चित्र ईएस2)।

चित्र ES 2: 2021 में उपचारित अपशिष्ट जल का सिंचाई के लिए दोबारा इस्तेमाल करके 966 बिलियन रुपये का राजस्व सृजित किया जा सकता था

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स्रोतः हॉर्टिकल्चर स्टैटिस्टिक्स एट ए ग्लांस 2018 (कृषि सहकारिता एवं कृषक विभाग, भारत सरकार), राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड 2022 के आंकड़ों का उपयोग करके लेखकों का विश्लेषण

  • 2021 में उपलब्ध उपचारित अपशिष्ट जल से लगभग 6,000 मीट्रिक टन पोषक तत्व प्राप्त किए जा सकते थे, जिससे 50 मिलियन रुपये की बचत हो सकती थी। हमारे आकलन के अनुसार, वर्तमान में उपलब्ध उपचारित अपशिष्ट जल (2021 में सिंचाई उपयोग के लिए) द्वारा आपूर्ति किए गए पोषक तत्वों की मात्रा 6,000 मीट्रिक टन से अधिक है। इसके अलावा, उपलब्ध पोषक तत्व के बाजार मूल्य के विश्लेषण के आधार पर हमारा आकलन है कि उपचारित अपशिष्ट जल के दोबारा इस्तेमाल से होने वाली सिंचाई के कारण कृत्रिम उर्वरकों के इस्तेमाल में कमी से कुल बचत 50 मिलियन रुपये से अधिक होगी (चित्र ES3)

​चित्र ES3: 2021 में उपचारित अपशिष्ट जल का सिंचाई के लिए उपयोग करके उर्वरक के उपयोग में कमी लाकर 50 मिलियन रुपये बचाए जा सकते थे

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स्रोत: सर्कुलर इकोनॉमी इन म्युनिसिपल सॉलिड एंड लिक्विड वेस्ट (2021), आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय (एमओएचयू), भारत सरकार के आंकड़ों का उपयोग करके लेखकों द्वारा किया गया विश्लेषण

  • उपचारित अपशिष्ट जल का सिंचाई में दोबारा इस्तेमाल करने से 2021 में ग्रीनहाउस गैस (जीएचजी) के उत्सर्जन में 1.3 मिलियन टन की कमी हो सकती थी। हमारे विश्लेषण से पता चलता है कि उपलब्ध उपचारित अपशिष्ट जल से 2021 में 1.38 मिलियन हेक्टेयर की सिंचाई हो सकती थी, जिससे भूजल-सिंचित क्षेत्र के 3.5 प्रतिशत हिस्से में पंप से भूजल दोहन घट सकता था। इससे 1 मिलियन टन जीएचजी उत्सर्जन में कमी आ सकती थी। इसके अतिरिक्त, उपचारित अपशिष्ट जल में अंतर्निहित पोषण मूल्य के कारण, उर्वरक की खपत भी घट सकती थी, जिससे जीएचजी उत्सर्जन में 0.3 मिलियन टन की अतिरिक्त कमी आ जाती।
  • 2021 में उपचारित अपशिष्ट जल का बाजार मूल्य 630 मिलियन रुपये हो सकता था। हमारे विश्लेषण से पता चलता है कि यदि हमारे पास विभिन्न क्षेत्रों को दोबारा इस्तेमाल करने के लिए उपचारित अपशिष्ट जल की बिक्री करने की व्यवस्था होती तो 2021 में उपलब्ध उपचारित अपशिष्ट जल का बाजार मूल्य (11,622 एमसीएम) 630 मिलियन रुपये से अधिक हो सकता था। मौजूदा बाजार दर पर उपचारित अपशिष्ट जल का बाजार मूल्य 2025 में 830 मिलियन रुपये और 2050 में 1.9 बिलियन रुपये से अधिक हो जाएगा।

 राज्यों की उपचारित अपशिष्ट जल के पुनर्उपयोग से संबंधित मौजूदा नीतियों की समीक्षा

हमने यह विश्लेषण भारतीय राज्यों की उपचारित अपशिष्ट जल के दोबारा इस्तेमाल करने से जुड़ी नीतियों की व्यापकता को समझने और भविष्य में उपचारित अपशिष्ट जल की बाजार संभावनाओं का दोहन करने की क्षमता का पता लगाने के लिए किया है। हमने पाया है कि भारत में सिर्फ 10 राज्यों के पास ही उपचारित अपशिष्ट जल को दोबारा इस्तेमाल करने की नीति मौजूद है और इनमें कुछ अंतर भी मौजूद हैं, जिन्हें दूर करने की आवश्यकता हैः

  • केवल कुछ राज्यों ने ही अपशिष्ट जल को उपचारित करने और दोबारा इस्तेमाल से जुड़े सकारात्मक पहलुओं को चिन्हित किया है। इनमें प्राकृतिक जल निकायों की जल गुणवत्ता में सुधार और संबंधित सार्वजनिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाला प्रभाव शामिल है।
  • केवल कुछ नीतियां ही उपचारित अपशिष्ट जल के दोबारा इस्तेमाल के लिए क्षेत्रों की प्राथमिकता का निर्धारण करती है इसके अलावा, केवल कुछ नीतियों ने उपचारित अपशिष्ट जल को अनिवार्य और गैर-अनिवार्य पुनर्उपयोग में वर्गीकृत किया है।
  • अधिकतर नीतियां अपशिष्ट जल शोधन के लिए प्रौद्योगिकियों के बारे में केवल संक्षिप्त सुझाव देती हैं। हमने जिन राज्यों की नीतियों की समीक्षा की है, उनमें से अधिकतर शोधन प्रक्रिया और प्रौद्योगिकी के बारे में जानकारी नहीं देती हैं। इसके अलावा, वे तृतीयक शोधन प्रक्रिया और प्रौद्योगिकियों का ही संक्षिप्त रूप से उल्लेख करती हैं।
  • अधिकतर नीतियां उपचारित अपशिष्ट जल के लिए आवंटन सिद्धांतों पर विचार नहीं करती हैं। उनके पास ऐसी क्रियान्वयन प्रणाली का अभाव है, जो उनके प्रभावी कार्यान्वयन के लिए एक रूपरेखा प्रदान करती हो।
  • उपचारित अपशिष्ट जल के दोबारा इस्तेमाल को बढ़ाने के लिए प्रोत्साहनों पर कोई चर्चा नहीं की गई है। अधिकतर राज्यों की नीतियों में अंतिम उपयोगर्ताओं के लिए ऐसे प्रोत्साहन का कोई प्रावधान नहीं है, जो उपचारित अपशिष्ट जल के दोबारा इस्तेमाल को बढ़ावा दे सके।
  • अधिकतर नीतियां समुदाय एवं औद्योगिक समूहों जैसे बाहरी हितधारकों की भूमिका को परिभाषित नहीं करती हैं। बड़े पैमाने पर उपचारित अपशिष्ट जल के दोबारा इस्तेमाल से जुड़ी सामुदायिक स्वीकृति के दृष्टिकोण से भी ऐसे विवरण महत्वपूर्ण होते हैं।
  • उपचारित अपशिष्ट जल को विशेष उद्देश्यों के लिए दोबारा इस्तेमाल से संबंधित गुणवत्ता मानकों को भी परिभाषित नहीं किया गया है। अधिकतर राज्यों की नीतियां केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) या राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एसपीसीबी) के उपचारित अपशिष्ट जल बहाव संबंधी मानकों को उपलब्ध कराती हैं। हालांकि, वे विशिष्ट उद्देश्यों के लिए दोबारा इस्तेमाल करने के लिए उपचारित अपशिष्ट जल के गुणवत्ता मानकों को परिभाषित नहीं करती हैं।
  • अधिकतर नीतियां प्रभावी कार्यान्वयन में सहायक बाध्यकारी प्रावधानों को परिभाषित नहीं करती हैं। यद्यपि अधिकतर राज्यों की नीतियां विभिन्न केंद्रीय और राज्य अधिनियमों को उनके नियामक ढांचे के रूप में संदर्भित करती हैं, लेकिन नीति कार्यान्वयन के लिए आवश्यक बाध्यकारी प्रावधानों का बहुत सीमित उल्लेख करती हैं।
  • समुचित व्यवसाय मॉडल के चयन की शर्त परिभाषित नहीं है। लगभग सभी राज्यों की नीतियां उपचारित अपशिष्ट जल के दोबारा इस्तेमाल संबंधी परियोजनाओं को विकसित करने के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) की अपील करती हैं। हालांकि, वे प्रभावी कार्यान्वयन के लिए समुचित व्यवसाय मॉडलों के चयन के लिए मानदंडों को शामिल नहीं करती हैं।

​हमें देखना चाहिए कि भले ही जनवरी 2023 में आई शोधित जल के सुरक्षित पुनर्उपयोग से संबंधित राष्ट्रीय रूपरेखा कुछ चिन्हित अंतरों के बारे में दिशा-निर्देश उपलब्ध कराती हों, लेकिन राज्यों की नीतियों को काफी पहले बनी थीं और उनमें इन कमियों को दूर करने के लिए संशोधन की जरूरत है।

वैश्विक सर्वोत्तम पद्धतियों से मिली सीख

तीन चुने हुए देशों (स्पेन, इजराइल और सिंगापुर), जो उपचारित जल के पुनर्उपयोग में एक उन्नत स्थिति में हैं, को लेकर हमारे विश्लेषण के आधार पर हमने प्रमुख प्रेरकों, बाधाओं और सहायक कारकों को चिन्हित किया है, जिनको हमने चित्र ES4 में दिखाया है।

चित्र ES4: वैश्विक स्तर पर, उपचारित अपशिष्ट जल के दोबारा इस्तेमाल संबंधी नीति के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए मजबूत प्रबंधन सर्वाधिक सहायक कारक रहा।

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स्रोत: लेखकों का विश्लेषण

सुझाव

राज्यों की वर्तमान नीतियों की समीक्षा और वैश्विक सर्वोत्तम पद्धितियों से मिली सीख के आधार पर, हम भारत में उपचारित अपशिष्ट जल के दोबारा इस्तेमाल से जुड़े मौजूदा प्रबंधन व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए ये निम्नलिखित सुझाव देते हैं:

  • सोच में व्यापक बदलाव किया जाए: अपशिष्ट जल को जल संसाधनों का ही एक अभिन्न अंग मानना चाहिए, और इसी कारण से जल प्रबंधन की सभी नीतियों, योजनाओं और विनियमों में इस पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।
  • जल गुणवत्ता मानकों को परिभाषित करें: जोखिम घटाने वाले दृष्टिकोण और नियमित निगरानी व आकलन के लिए एक आवधिक समीक्षा तंत्र के साथ, उपचारित अपशिष्ट जल के सुरक्षित बहाव (safe discharge) और पुनर्उपयोग के लिए जल गुणवत्ता मानकों को अच्छी तरह से परिभाषित करने की आवश्यकता है।
  • सशक्त संस्थागत प्रणालियां स्थापित करें: शहरी स्थानीय निकायों को स्पष्ट रूप से परिभाषित भूमिकाओं और जिम्मेदारियों के साथ दीर्घकालिक, शहर-स्तरीय अपशिष्ट जल के दोबारा इस्तेमाल से जुड़ी योजनाओं को बनाने और उन्हें अपनाने के लिए सशक्त बनाया जाना चाहिए। इसके अलावा, उपचारित अपशिष्ट जल के पुनर्उपयोग संबंधी परियोजनाओं के सफल कार्यान्वयन के लिए संस्थागत व्यवस्थाओं में अंतिम उपयोगकर्ता समूहों को जोड़ना चाहिए।
  • वित्तीय व्यवहार्यता में सुधारः अपशिष्ट जलशोधन संयंत्रों के संचालकों/अंतिम उपयोगकर्ताओं के लिए प्रदर्शन-आधारित लक्षित प्रोत्साहन और उपचारित अपशिष्ट जल के लिए बाजार संभावनाओं व अंतिम-उपयोगकर्ताओं की विभिन्न श्रेणियों व उनकी भुगतान क्षमताओं पर विचार करते हुए एक प्रभावी मूल्य निर्धारण तंत्र को लाना चाहिए। यह पुनर्उपयोग संबंधी परियोजनाओं की वित्तीय व्यवहार्यता में सुधार लाने के लिए एक उत्प्रेरक का काम कर सकता है।
  • तकनीकी विकास का लाभ उठाएं: अपशिष्ट जल शोधन की कुशलता और प्रभावशीलता को बनाए रखने के लिए आवश्यकता-आधारित और मांग-प्रेरित प्रौद्योगिकी को उन्नत बनाने की जरूरत है। इसके लिए हमें एक समर्पित कोष की आवश्यकता है, ताकि संसाधन दक्षता को अधिकतम बनाने वाली प्रौद्योगिकियों के लिए शोध एवं विकास का कार्य किया जा सके। भारतीय राज्यों को इस क्षेत्र में शोध एवं विकास के लिए एक स्पष्ट रणनीति के साथ आगे आना चाहिए। उन्हें ऐसी किफायती, अत्यधिक ऊर्जा-कुशल तकनीकी नवाचारों पर विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए, जिन्हें अन्य प्रासंगिक वैश्विक संस्थाओं के साथ साझेदारी में विकसित किया जा सकता है।
  • जन-संपर्क में निवश करें: भारतीय राज्यों को अपशिष्ट जल के दोबारा इस्तेमाल संबंधी परियोजनाओं के सफल कार्यान्वयन के लिए जनता का विश्वास बढ़ाने और व्यवहार परिवर्तन के लिए प्रभावी जन संपर्क योजनाएं विकसित करनी चाहिए।

डिस्क्लेमर : यह मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित रिपोर्ट का हिंदी अनुवाद है। हमने इसके अनुवाद में पूरी सतर्कता बरती है। यदि इसमें कोई भ्रम होता है या भूलवश कोई त्रुटि सामने आती है तो इसका अंग्रेजी संस्करण ही मान्य होगा।

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